जनहित का चोला ओढ़े आज तमाम लोग मैदान में हैं। जनसेवा के नाम से जनता को गुमराह कर अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ को साधने में लगे हुवे हैं। सेवारत लोगो का आम समाज को त्याग राजनीति में आना इसका ताजा उदाहरण है। जो जनता को साधते हुवे अपनी सेवा को निस्वार्थ दर्शाता रहा है, वह सक्रिय राजनीति में आते ही अपनी पहली मंशा को उजागर कर बैठता है कि उसका पूर्व में किया गया कार्य निस्वार्थ नही था।
जनता हालातो की मांनिद हो चुकी है, वो अगले चरण में किसी दूसरे को समाजसेवी का चोला पहना देती हैं ये कहते हुवे की हम पूर्व में उसकी मंशा को नही भाप सके किन्तु इसबार का हमारा चुनाव किन्ही सूरतो में गलत नही हो सकता।
और पुनः वही स्थिति दोहराई जाती है। हमे इस व्यवस्था का आदि नही होना है अपितु इसकी व्यवस्था की जड़ में फल फूल रहे कारोबार को ध्वस्त करने की दिशा में ध्यान देने की आवश्यक्ता है।
......धन्यवाद
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