Saturday, February 24, 2018

Miss u shreee

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Sunday, January 7, 2018

लपेटे में लालू


इन दिनों राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव सुर्खियों में बने हुवे है। मुद्दा हैं, बिहार सरकार में हुवे पशुपालन घोटाले का

मै इसे चारा घोटाला इस लिए नही कह रहा हूँ क्योंकि बिहार सरकार के खजाने का दुर्पयोग कर कई वर्षो में पशुपालन विभाग के अधिकारियों एवंम ठेकेदारों की मिली भगत से ही करोडो की धनराशि का बंदरबाँट किया गया था, अतः इसे पशुपालन घोटाला कहाँ जाना ही उचित होगा। इतने बड़े कांड में राजनीतिक मिली भगत ना हो यह कदापि सम्भव नही है, लिहाजा तत्कालिक मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव इसके लपेटे में हैं।

शुरुवाती जांच में ये मामला एक दो करोड़ से शुरू हुवा और बढ़ते समय के साथ साथ इसमे लिप्त लोगो की संख्या और इस धनराशि का आंकड़ा भी बढ़ता गया। बाद में यह कुल धनराशि 900 करोड़ तक जा पहुँची। तत्कालिक समय का यह बहुत बड़ा घोटाला था
इसकी पोल 1994 से खुलनी शुरू हुई। इसी साल प्रदेश के शहरों रांची, पटना, डोरंडा, जैसे कई शहरों के कोषागारों से फर्ज़ी बिलो के जरिए कथित तौर पर अवैध निकसी के मामले दर्ज किए गए।
रातो रात पशुपालन विभाग व सरकारी कोषागारों से सम्बंधित सैकड़ो कर्मचारी गिरफ्तार किए गए, इन मामलातो से जुड़े कई ढेकेदारो और सप्लायरों को भी हिरासत में लिया गया
मामला ज्यो ज्यो आगे बढ़ा इसमे कई राजनेताओ के सरीख होने की बाते उजागर होने लगी। विपक्ष ने स्थिति को भाँपते हुवे इसकी सीबीआई जाँच कराने की मांगें तेज़ कर दी।

सीबीआई को मामले की जांच की कमान मिली। संयुक्त निदेशक यूएन विश्वास की जाचं ने ही इसका रुख़ बदल दिया। सीबीआई ने अपनी शुरुवाती जांच रिपोर्ट में यह दर्शाया की मामला इतना सीधा नही है जितना बाहर से दिखाई दे रहा है, और बिहार की सरकार जिस प्रकार से बता रही है।
सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट में दर्शाया की चारे घोटाले में शामिल सभी अभियुक्त के सम्बंध राजद व अन्य पार्टियों के शीर्ष नेताओ से रहे है, इसका भी पर्याप्त सबूत रहा कि उस काली कमाई का हिस्सा नेताओ की झोली में गया।
सीबीआई ने अपनी जाँच में कहा की राज्य के खजाने के करोड़ो रूपये अनवरत कई वर्षो मे, पशुओं के चारे, पशुओं की दवा इत्यादि की शक्ल में फ़र्ज़ी बिलो द्वारा नियमित रूप से भुनाए गए।
सीबीआई के अनुसार मुख्य लेखा परीक्षक ने समय समय पर इस बात का जानकारी राज्य सरकार को भेजी भी थीं मगर तात्कालिक बिहार सरकार ने इस पर ध्यान नही दिया।

मामला सिर्फ़ राष्ट्रीय जनता दल तक सीमित नहीं रहा। इस सिलसिले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर जगन्नाथ मिश्र को गिरफ़्तार किया गया। राज्य के अन्य दूसरे मंत्री भी गिरफ़्तार किए गए। सीबीआई ने तत्कालिक मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के खिलाफ भी आरोप पत्र दाखिल किया, जिसके चलते उन्हें अपने पद से स्तीफा देना पड़ा।
वह कई महीनों तक जेल में रहे बाद में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से
जमानत मिली।
इसका असर राजद के राजनीतिक पृष्ठभूमि पर भी पड़ा, पार्टी लम्बे समय तक बिहार में सरकार बना पाने में असफल रही।

राज्य के बंटवारे के वक्त भी यह मामला सुर्ख़ियों में रहा, इसकी सुनवाई रांची हाईकोर्ट में होगी या पटना हाईकोर्ट में यह भी चर्चा का विषय बना रहा।

तत्काल में इससे जुड़े एक केस में अभी हाल में ही एक फैसला आया है जिसमे राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को साढ़े तीन साल की सजा और 5लाख का जुर्माना घोषित किया गया है।

Saturday, January 6, 2018

लघु-कथा

वो सर्द रात भी कम्बख़्त कहाँ किसी को बख़्सने वाली थी।
पारा भी लुढ़कर मानो अर्स पर उतर आने को उतारू हो गया था। ऐसे में सर पर छत का ना होना मानो कयामत का होना था। इस सर्द भरी रात में मै रेलवे स्टेशन पर उतर कर अपने गंतव्य स्थान तक पहुचने के लिए स्टेशन परिसर से बाहर सटे बस स्टेण्ड पर खड़ा था।
स्याह सी रात मानो धुंध की चादर में सिमटी नई नवेली दूल्हन सी अपनी छटा बिखेर रही थी। ये दृश्य देखने मे तो मनमोहक, मगर जानलेवा था। अचानक से मेरी नज़र दूर सड़क पर पड़े कुछ अजीबो गरीब चीज़ों पर पड़ी, धुंध ज्यादे होने की वजह से कुछ साफ़ नज़र नही आ रहा था। न जाने क्यों मगर मेरे मन मे उसे समझ पाने की तीव्र इक्क्षा घर करने लगी। आस पास कोई गाड़ी भी अभी आती नही दिख रही थी, कौतूहल वश मैं अपनी आँखों देखी का जायजा लेने ठिठुरते हूवे आगे बढ़ने लगा। जब उसके समीप पहुँचा तो मैं स्तब्ध रह गया एक औरत अपने नवजात बच्चे को सीने से लगाये खुद में सिमटी हुई थी। कुछ इस तरह मानो वह एक गठ्ठर हो।
उसके बदन पर गर्म कपड़ों की तंगी ने मुझे अंदर तक झिंझोर कर रख दिया था। कमोवेश मेरे शरीर पर उससे कही ज्यादे गर्म कपड़े थे, फिर भी इन थोड़े समय मे भी मै इस ठंढ को बर्दाश्त नही कर पा रहा था हे ईश्वर यह अबला आखिर कैसे इस प्रकोप को बर्दाश्त कर रही होगी।

आखिर यह महिला किन परिस्थितियों में यहाँ पड़ी है यह जानने के लिए मैने हिम्मत जुटाकर उससे उसके यहाँ होने की वजह पूछी, "तुम यहाँ क्यों हो इस सर्द रात में इस खुले आसमान के नीचे,"
उसका जवाब था "बाबु बेघरों का ठिकाना ये खुली छत ही तो है।"
मैं स्तब्ध था और निशब्द भी मन मे तमाम तरह के सवाल उठ रहे थे कि जब ऊपर वाला सबका पालनहार है तो क्या वह इतना कठोर हो सकता है कि उसे यह पीड़ा ना दिखायी दे। मन इस तरह के हज़ारो ख्यालो से भर उठा था तभी दूर से आती बस की आवाज़ कानो में पड़ी मुड़कर उसे रोकने का इशारा किया, अभी भी मैं अपनी उचित स्थिति नही समझ पा रहा था।
मैंने अपनी दुशाला उतारी औऱ उसे उस महिला के शरीर पर डाल दी और बस की तरफ चल दिया। वो मुझे जाते हुवे देखती रही।

अल्फ़ाज़ ये अपने.....

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(1)-  किनारो के दो छोर जीवन के दो
         सत्य को दर्शाने के लिए होते है।

         पहला छोर दर्शाता हैं, प्रतिबद्धता
         और दूसरा छोर, परिणाम

         .....................साहेब

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(2)-  आक्रमक्ता से दुनिया जीती जा सकती है।
           किन्तु.....
           दिल नही।

         विनम्र बने, औरो के सहयोग
         को सहज उपलब्ध रहे।

         ..........................साहेब

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(3)-  मसला यह है कि शुरुवात कहा से हो।

         खत्म कहा होना है,

        यह तो पूर्व ही लिखा जा चुका है।

         ........................साहेब

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(4)-  इस वहम में जीना की सब निपटा के जाऊंगा

         कोई उन्हें बताये…..
        खुद के ताबूत की आखरी कील भी
       औरो के हाथों ही मुकम्मल होनी है

        ..........................साहेब

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(5)-  इतना बड़ा भी नही हो गया
          कि भाई छोटे लगने लगे।

        बड़प्पन उस वक्त दिखाऊँगा
        जब किसी अपने को मेरी जरूरत होगी

          …………..साहेब

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(6)-  बेहद संजीदगी से काट लो ज़िन्दगी
          अपनी

          कुछ इतना तो कर्म हो
        कि ईमान सबका धर्म हो

         किसी ने सच ही कहा है
       दुवाओ का अपना कोई रंग नही होता
      मगर ये रंग लाती है

       .................साहेब

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(7)-.  जिनकी फितरत मे
           हवाओं के साथ

          उड़ जाना लिखा है।
        सुना है वो बादल बहुत गरजते है।

         …..……….………………साहेब

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(8)-  हर चाल मात के लिए चली है।
         आखिर आपनो से नही हारेंगे,

          तो आगे कैसे बढ़ेंगे।

           …..……….………………साहेब

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(9)- किसी के मुक्कमल वज़ूद का अंदाजा इस बात से
        ना लगा "साहेब"

        की पीछे लोग कितने है....
       भीड़ तो जनाज़ों में भी भरपूर होती है।

         …..……….………………साहेब

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(10) - छद्मावरण का ज़माना है,
          और उस पर ये की

        मैं किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रसित नही हूँ।
       😢शायद इतनी वजह मुक्कमल है यह बताने को
        कि मैं झुंड में नही पाया जाता हूँ।

           …..……….………………साहेब

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(11) - जिनके खुद के चूल्हे भी पड़ोसियों की
           मेहरबानी से ही सुलगते है।

          सूना है, वो भी आजकल ज़माने भर को
          आग लगा देने की बात करते है।

           …..……….………………साहेब

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(12)- वो जल के खाक हूवे
          और हम धुँआ...
         फर्क बस इतना रहा कि,
         उनको मिट्टी नशीब हुई हमें खुला आसमाँ....

           …..……….………………साहेब

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(13) - वो क्या निकालेंगे मेरी पीठ का ख़ंजर...
         "साहेब" खुद की ढाल उन्ही को बनाये,
           मैं ज़माने में फिरता था।

           …..……….………………साहेब

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(14) - इंतज़ार एक तू ही तो है......
          जो आखरी लम्हों तक साथ है मेरे।
          "साहेब" शुक्रिया उनका भी
           जिन्होंने तुमसे रुबरू कराया।

           …..……….………………साहेब

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(15) - हम तुम्हे किसी और रोज़ मारेंगें...
           "साहेब"!....

          क्या करे आज तेरे चेहरे पर मुस्कान बहुत है।

           …..……….………………साहेब

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(16) - जुनून इस उमर का ही रंग लाता हैं।
           लहू का हर कतरा इंक़लाब के गीत गाता है।
          जिनके हाथों में हुनर बंदूकें बोने का हो..
          वही शेरदिल भगत सिंह बन पाता है।

           …..……….………………साहेब

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(17) - शिखर पर नही पहुँचा अभी तू बुलन्दी के
           जो तेरे लिए इंक़लाब लिखू।
          आबाद रह पाए तू अपने विचारों के साथ काश...,
          की तेरे लिये मैं ज़िंदाबाद लिखूँ

           …..……….………………साहेब

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(18) - ऐसा नही की सीख नही सकता!
         मगर ये ज़िन्दगी किसी को सबक,
         एक झटके में नही देती।
         तिनका तिनका सहेजें हुवे जो घरोंदों को बनाते हैं।
        सफलता,सृजन के महत्वपूर्ण लक्ष्य की प्राप्ति कैसे
        की जाए ये जमाने को बताते है।

           …..……….………………साहेब

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(19) - जो जितना ठहरा है...
           वो उतना ही गहरा है।
           वक्त से ना पूछ तू ये"साहेब"
           वक्त पर किसका पहरा है।

           तुम शोलो को हवाओं का खौफ देते हो..
         हमने चिंगारियों को भी आँधियों से लड़ते देखा है।

           …..……….………………साहेब

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(20) - वक्त बेवक्त खटकने के लिए मैं तेरे आँखों का
            तिनका नही
          "साहेब" मैं वो तिनका हूँ...
          जिसे अगर चिंगारी मिले, तो तेरी हस्ती मिटा दूँ।

           …..……….………………साहेब

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(21) - किसी से सुना था उन्होंने "साहेब"....
         आँशुओ में बड़ी ताकत होती हैं।

        कम्बख़्त उस पल से रो रहे है मेरी हस्ती मिटाने को।

           …..……….………………साहेब

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(22) - "साहेब" जरा सम्भल कर.....
           आईना अंधों को दिखाना हैं।

           …..……….………………साहेब

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(23) - भाई हम अपने विचारो के साथ
           आपसे टकराते रहेंगें।

          आप तो जनाब बस बगल में लबेदियाने
           वाली कितबिया दबाये जमे रहिएगा।

           …..……….………………साहेब

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(24) - ज़मीर ज़माने को..
           तुझे अपने जज़्बात दिखता।
           तू अगर अपना ना होता...
           तुझे तेरी औकात दिखता।

           …..……….………………साहेब

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(25) - तमाचों की आवाज़ें आ रही है।

            निःसन्देह ये तुम ही हो ना,
          बस तुम्हारी जगह तय नही कर पा रहा हूँ।

           …..……….………………साहेब

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(26) - टिड्डों को अगर रहमती पंख मिल जाये
            फ़िर भी वो बाज़ से

            उड़ान में मुकाबला नही कर सकते।

           …..……….………………साहेब

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(27) - जिस रोज़ हिसाब होगा.
            तो कुछ छीटे हमारे दामन पर होंगे!
            पर शर्तिया तुम उनमे सराबोर होगे।

           …..……….………………साहेब

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(28) - दर्दे-दिल के, ये आँशु दवा बन गए।
           फूल ही आज कत्ल की वजह बन गए...
            मेरी क्या खता,

            दूर तुम मुझसे हुवे।
          अर्श पर पहुँचने की सीढ़ियां, हम बेवज़ह बन गए।

           …..……….………………साहेब

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(29) - हरकतों से तुम भी "साहेब" आदिल ही लगते हो।
            ईमानदारी को इतना तेल लगता कौन हैं।

           …..……….………………साहेब

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(30) - हालात बदल रहे हैं "साहेब" बस इन्ही
            वजहों से मौन है।
           वरना यहाँ सिवाय चाटुकारों के,
           किसी की सुनता कौन है।

           …..……….………………साहेब

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(31) - मुझसे ज़माने के हालात पूछ "साहेब"
           मुकम्मल जवाब दूँगा।
           बस मेरे घर के हालात मत पूछना।

           …..……….………………साहेब

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(32) - अपना अपना नज़रिया है "साहेब"
            वैसे हीरे की परख तो जौहरी को भी नही होतीं।
             वरना वो उसके मोल नही लगाता।

           …..……….………………साहेब

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(33)- उन्हें मेरा पयाम हैं "साहेब"
           जो खुद को पाकीजा समझते हैं।
           नारास्ती के रास्तों से कमाया नूर भी
           कुछ वक्त को ही सुकून देता है।

           …..……….………………साहेब

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(34) - जब दूसरों के पैजामे पर हमला बोलना
            होता है..
           तो खुद का नाड़ा
           टाईट कर लेना चाहिए।
          क्या पता कब खुद के लंगोट की पोल खुल जाए।

           …..……….………………साहेब

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(35)- वो जिनको किनारों तक पहुँचाने का
           ज़िम्मा सौपा था।
         वो बीच मंझधार में सिक्के बनाने में लग गए है।

           …..……….………………साहेब

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(36)- ईश्वर सबके गुनाह माफ़ करता हैं।
            इसका मतलब ये नही

            की हम करते रहे,
            ये सोचकर कि वो तो फ़ुर्सत में बैठा ही हैं
            माफ़ी देने के लिए।

           …..……….………………साहेब

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(37)- ये जो मुझमे दिखती सादगी...
           संज़ीदगी हैं।
           कोई फ़रेब नही है

          औऱ जहाँ "साहेब" सिर्फ तुम हो...
          वहाँ कोई ऐब नही है।

           …..……….………………साहेब

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(38)  -आरक्षण_का_दर्द

        आये जो इस बाजार में, मशहूर हो गए
        उल्फत में नशे के हम भी मग़रूर हो गए।
        लगा कि सिकंदर है सब जीत ही जाएँगे...
        बेड़ियो से जो बंधे चकनाचूर हो गये।

           …..……….………………साहेब

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Friday, January 5, 2018

जनहित भावना सेवा या स्वार्थ

जनहित का चोला ओढ़े आज तमाम लोग मैदान में हैं। जनसेवा के नाम से जनता को गुमराह कर अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ को साधने में लगे हुवे हैं। सेवारत लोगो का आम समाज को त्याग राजनीति में आना इसका ताजा उदाहरण है। जो जनता को साधते हुवे अपनी सेवा को निस्वार्थ दर्शाता रहा है, वह सक्रिय राजनीति में आते ही अपनी पहली मंशा को उजागर कर बैठता है कि उसका पूर्व में किया गया कार्य निस्वार्थ नही था।
जनता हालातो की मांनिद हो चुकी है, वो अगले चरण में किसी दूसरे को समाजसेवी का चोला पहना देती हैं ये कहते हुवे की हम पूर्व में उसकी मंशा को नही भाप सके किन्तु इसबार का हमारा चुनाव किन्ही सूरतो में गलत नही हो सकता।

और पुनः वही स्थिति दोहराई जाती है। हमे इस व्यवस्था का आदि नही होना है अपितु इसकी व्यवस्था की जड़ में फल फूल रहे कारोबार को ध्वस्त करने की दिशा में ध्यान देने की आवश्यक्ता है।

......धन्यवाद

Miss u shreee

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