वो सर्द रात भी कम्बख़्त कहाँ किसी को बख़्सने वाली थी।
पारा भी लुढ़कर मानो अर्स पर उतर आने को उतारू हो गया था। ऐसे में सर पर छत का ना होना मानो कयामत का होना था। इस सर्द भरी रात में मै रेलवे स्टेशन पर उतर कर अपने गंतव्य स्थान तक पहुचने के लिए स्टेशन परिसर से बाहर सटे बस स्टेण्ड पर खड़ा था।
स्याह सी रात मानो धुंध की चादर में सिमटी नई नवेली दूल्हन सी अपनी छटा बिखेर रही थी। ये दृश्य देखने मे तो मनमोहक, मगर जानलेवा था। अचानक से मेरी नज़र दूर सड़क पर पड़े कुछ अजीबो गरीब चीज़ों पर पड़ी, धुंध ज्यादे होने की वजह से कुछ साफ़ नज़र नही आ रहा था। न जाने क्यों मगर मेरे मन मे उसे समझ पाने की तीव्र इक्क्षा घर करने लगी। आस पास कोई गाड़ी भी अभी आती नही दिख रही थी, कौतूहल वश मैं अपनी आँखों देखी का जायजा लेने ठिठुरते हूवे आगे बढ़ने लगा। जब उसके समीप पहुँचा तो मैं स्तब्ध रह गया एक औरत अपने नवजात बच्चे को सीने से लगाये खुद में सिमटी हुई थी। कुछ इस तरह मानो वह एक गठ्ठर हो।
उसके बदन पर गर्म कपड़ों की तंगी ने मुझे अंदर तक झिंझोर कर रख दिया था। कमोवेश मेरे शरीर पर उससे कही ज्यादे गर्म कपड़े थे, फिर भी इन थोड़े समय मे भी मै इस ठंढ को बर्दाश्त नही कर पा रहा था हे ईश्वर यह अबला आखिर कैसे इस प्रकोप को बर्दाश्त कर रही होगी।
आखिर यह महिला किन परिस्थितियों में यहाँ पड़ी है यह जानने के लिए मैने हिम्मत जुटाकर उससे उसके यहाँ होने की वजह पूछी, "तुम यहाँ क्यों हो इस सर्द रात में इस खुले आसमान के नीचे,"
उसका जवाब था "बाबु बेघरों का ठिकाना ये खुली छत ही तो है।"
मैं स्तब्ध था और निशब्द भी मन मे तमाम तरह के सवाल उठ रहे थे कि जब ऊपर वाला सबका पालनहार है तो क्या वह इतना कठोर हो सकता है कि उसे यह पीड़ा ना दिखायी दे। मन इस तरह के हज़ारो ख्यालो से भर उठा था तभी दूर से आती बस की आवाज़ कानो में पड़ी मुड़कर उसे रोकने का इशारा किया, अभी भी मैं अपनी उचित स्थिति नही समझ पा रहा था।
मैंने अपनी दुशाला उतारी औऱ उसे उस महिला के शरीर पर डाल दी और बस की तरफ चल दिया। वो मुझे जाते हुवे देखती रही।
उपर वाले ने बहुत से रंग बनाये हैं , दुःख देता है तो कम करने के लिए भी किसी को भेजता है । हम और आप तो सिर्फ माध्यम हैं ,रचनाकार तो वही है।
ReplyDeleteजी अरविन्द भईया आपका नज़रिया सही है, हम माध्यम है और माध्यम को अपना कार्य पूरी ईमानदारी और निष्ठा से सम्पन्न करना चाहिए
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