Saturday, January 6, 2018

अल्फ़ाज़ ये अपने.....

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(1)-  किनारो के दो छोर जीवन के दो
         सत्य को दर्शाने के लिए होते है।

         पहला छोर दर्शाता हैं, प्रतिबद्धता
         और दूसरा छोर, परिणाम

         .....................साहेब

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(2)-  आक्रमक्ता से दुनिया जीती जा सकती है।
           किन्तु.....
           दिल नही।

         विनम्र बने, औरो के सहयोग
         को सहज उपलब्ध रहे।

         ..........................साहेब

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(3)-  मसला यह है कि शुरुवात कहा से हो।

         खत्म कहा होना है,

        यह तो पूर्व ही लिखा जा चुका है।

         ........................साहेब

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(4)-  इस वहम में जीना की सब निपटा के जाऊंगा

         कोई उन्हें बताये…..
        खुद के ताबूत की आखरी कील भी
       औरो के हाथों ही मुकम्मल होनी है

        ..........................साहेब

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(5)-  इतना बड़ा भी नही हो गया
          कि भाई छोटे लगने लगे।

        बड़प्पन उस वक्त दिखाऊँगा
        जब किसी अपने को मेरी जरूरत होगी

          …………..साहेब

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(6)-  बेहद संजीदगी से काट लो ज़िन्दगी
          अपनी

          कुछ इतना तो कर्म हो
        कि ईमान सबका धर्म हो

         किसी ने सच ही कहा है
       दुवाओ का अपना कोई रंग नही होता
      मगर ये रंग लाती है

       .................साहेब

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(7)-.  जिनकी फितरत मे
           हवाओं के साथ

          उड़ जाना लिखा है।
        सुना है वो बादल बहुत गरजते है।

         …..……….………………साहेब

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(8)-  हर चाल मात के लिए चली है।
         आखिर आपनो से नही हारेंगे,

          तो आगे कैसे बढ़ेंगे।

           …..……….………………साहेब

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(9)- किसी के मुक्कमल वज़ूद का अंदाजा इस बात से
        ना लगा "साहेब"

        की पीछे लोग कितने है....
       भीड़ तो जनाज़ों में भी भरपूर होती है।

         …..……….………………साहेब

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(10) - छद्मावरण का ज़माना है,
          और उस पर ये की

        मैं किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रसित नही हूँ।
       😢शायद इतनी वजह मुक्कमल है यह बताने को
        कि मैं झुंड में नही पाया जाता हूँ।

           …..……….………………साहेब

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(11) - जिनके खुद के चूल्हे भी पड़ोसियों की
           मेहरबानी से ही सुलगते है।

          सूना है, वो भी आजकल ज़माने भर को
          आग लगा देने की बात करते है।

           …..……….………………साहेब

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(12)- वो जल के खाक हूवे
          और हम धुँआ...
         फर्क बस इतना रहा कि,
         उनको मिट्टी नशीब हुई हमें खुला आसमाँ....

           …..……….………………साहेब

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(13) - वो क्या निकालेंगे मेरी पीठ का ख़ंजर...
         "साहेब" खुद की ढाल उन्ही को बनाये,
           मैं ज़माने में फिरता था।

           …..……….………………साहेब

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(14) - इंतज़ार एक तू ही तो है......
          जो आखरी लम्हों तक साथ है मेरे।
          "साहेब" शुक्रिया उनका भी
           जिन्होंने तुमसे रुबरू कराया।

           …..……….………………साहेब

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(15) - हम तुम्हे किसी और रोज़ मारेंगें...
           "साहेब"!....

          क्या करे आज तेरे चेहरे पर मुस्कान बहुत है।

           …..……….………………साहेब

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(16) - जुनून इस उमर का ही रंग लाता हैं।
           लहू का हर कतरा इंक़लाब के गीत गाता है।
          जिनके हाथों में हुनर बंदूकें बोने का हो..
          वही शेरदिल भगत सिंह बन पाता है।

           …..……….………………साहेब

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(17) - शिखर पर नही पहुँचा अभी तू बुलन्दी के
           जो तेरे लिए इंक़लाब लिखू।
          आबाद रह पाए तू अपने विचारों के साथ काश...,
          की तेरे लिये मैं ज़िंदाबाद लिखूँ

           …..……….………………साहेब

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(18) - ऐसा नही की सीख नही सकता!
         मगर ये ज़िन्दगी किसी को सबक,
         एक झटके में नही देती।
         तिनका तिनका सहेजें हुवे जो घरोंदों को बनाते हैं।
        सफलता,सृजन के महत्वपूर्ण लक्ष्य की प्राप्ति कैसे
        की जाए ये जमाने को बताते है।

           …..……….………………साहेब

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(19) - जो जितना ठहरा है...
           वो उतना ही गहरा है।
           वक्त से ना पूछ तू ये"साहेब"
           वक्त पर किसका पहरा है।

           तुम शोलो को हवाओं का खौफ देते हो..
         हमने चिंगारियों को भी आँधियों से लड़ते देखा है।

           …..……….………………साहेब

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(20) - वक्त बेवक्त खटकने के लिए मैं तेरे आँखों का
            तिनका नही
          "साहेब" मैं वो तिनका हूँ...
          जिसे अगर चिंगारी मिले, तो तेरी हस्ती मिटा दूँ।

           …..……….………………साहेब

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(21) - किसी से सुना था उन्होंने "साहेब"....
         आँशुओ में बड़ी ताकत होती हैं।

        कम्बख़्त उस पल से रो रहे है मेरी हस्ती मिटाने को।

           …..……….………………साहेब

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(22) - "साहेब" जरा सम्भल कर.....
           आईना अंधों को दिखाना हैं।

           …..……….………………साहेब

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(23) - भाई हम अपने विचारो के साथ
           आपसे टकराते रहेंगें।

          आप तो जनाब बस बगल में लबेदियाने
           वाली कितबिया दबाये जमे रहिएगा।

           …..……….………………साहेब

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(24) - ज़मीर ज़माने को..
           तुझे अपने जज़्बात दिखता।
           तू अगर अपना ना होता...
           तुझे तेरी औकात दिखता।

           …..……….………………साहेब

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(25) - तमाचों की आवाज़ें आ रही है।

            निःसन्देह ये तुम ही हो ना,
          बस तुम्हारी जगह तय नही कर पा रहा हूँ।

           …..……….………………साहेब

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(26) - टिड्डों को अगर रहमती पंख मिल जाये
            फ़िर भी वो बाज़ से

            उड़ान में मुकाबला नही कर सकते।

           …..……….………………साहेब

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(27) - जिस रोज़ हिसाब होगा.
            तो कुछ छीटे हमारे दामन पर होंगे!
            पर शर्तिया तुम उनमे सराबोर होगे।

           …..……….………………साहेब

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(28) - दर्दे-दिल के, ये आँशु दवा बन गए।
           फूल ही आज कत्ल की वजह बन गए...
            मेरी क्या खता,

            दूर तुम मुझसे हुवे।
          अर्श पर पहुँचने की सीढ़ियां, हम बेवज़ह बन गए।

           …..……….………………साहेब

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(29) - हरकतों से तुम भी "साहेब" आदिल ही लगते हो।
            ईमानदारी को इतना तेल लगता कौन हैं।

           …..……….………………साहेब

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(30) - हालात बदल रहे हैं "साहेब" बस इन्ही
            वजहों से मौन है।
           वरना यहाँ सिवाय चाटुकारों के,
           किसी की सुनता कौन है।

           …..……….………………साहेब

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(31) - मुझसे ज़माने के हालात पूछ "साहेब"
           मुकम्मल जवाब दूँगा।
           बस मेरे घर के हालात मत पूछना।

           …..……….………………साहेब

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(32) - अपना अपना नज़रिया है "साहेब"
            वैसे हीरे की परख तो जौहरी को भी नही होतीं।
             वरना वो उसके मोल नही लगाता।

           …..……….………………साहेब

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(33)- उन्हें मेरा पयाम हैं "साहेब"
           जो खुद को पाकीजा समझते हैं।
           नारास्ती के रास्तों से कमाया नूर भी
           कुछ वक्त को ही सुकून देता है।

           …..……….………………साहेब

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(34) - जब दूसरों के पैजामे पर हमला बोलना
            होता है..
           तो खुद का नाड़ा
           टाईट कर लेना चाहिए।
          क्या पता कब खुद के लंगोट की पोल खुल जाए।

           …..……….………………साहेब

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(35)- वो जिनको किनारों तक पहुँचाने का
           ज़िम्मा सौपा था।
         वो बीच मंझधार में सिक्के बनाने में लग गए है।

           …..……….………………साहेब

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(36)- ईश्वर सबके गुनाह माफ़ करता हैं।
            इसका मतलब ये नही

            की हम करते रहे,
            ये सोचकर कि वो तो फ़ुर्सत में बैठा ही हैं
            माफ़ी देने के लिए।

           …..……….………………साहेब

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(37)- ये जो मुझमे दिखती सादगी...
           संज़ीदगी हैं।
           कोई फ़रेब नही है

          औऱ जहाँ "साहेब" सिर्फ तुम हो...
          वहाँ कोई ऐब नही है।

           …..……….………………साहेब

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(38)  -आरक्षण_का_दर्द

        आये जो इस बाजार में, मशहूर हो गए
        उल्फत में नशे के हम भी मग़रूर हो गए।
        लगा कि सिकंदर है सब जीत ही जाएँगे...
        बेड़ियो से जो बंधे चकनाचूर हो गये।

           …..……….………………साहेब

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